Saturday, August 14, 2010
Sunday, July 25, 2010
इशक की आग में समूचा हिन्दुस्ता झुलस रहा है।पंजाब के कपूरथला और दिल्ली सटे उत्तर परेद्श के जिला बुलंदशहर में एक दिन में इशक के चक्कर में तीन घटनाएं घटी हैं। कोई दिन ऐसा नहीं है जब देश के किसी न किसी हिस्से में दो चार लोग रोजाना इश्क की चक्की में नहीं पिसते हों। कपूरथला के कठुआ में एक पिता ने बेटी को करंट लगा मार डाला। मृतिका का नाम गुरजीत कौर है। पिता ने बेटी के प्रेमी को भी मारने की कोशिश की लेकिन वो बच गया और उसकी सूचना पर पुलिस ने हत्यारे पिता को गिरफ्तार कर लिया।
यूपी के बुलंदशहर में एक युवक की हत्या प्यार करने की वजह से कर दी गई। मृतक जिस लड़की से प्यार करता था वो रिश्ते में उसकी मौसी लगती थी।
यूपी के बुलंदशहर में ही एक ही गोत्र में प्यार करने की सजा दो प्यार करने वालो को मिली। समाज ने उनके प्यार को अस्वीकार कर दिया जसके बाद प्रेमी जोड़े ने जहर खाकर खुदकुशी कर ली।
बुलंदशहर के तनु और गुड़्डू एक दूसरे बेहद प्यार करते थे। दोनों एक ही गोत्र के थे। दोनों ने शुक्रवार को खुदकुशी कर ली। गांव के लोगों के मुताबिक दोनों एक ही कुनबे के थे। जाति और गोत्र भी एक ही था। इसलिए समाज की नजर में वो रिश्ते से भाई बहन थे। कुछ महीने पहले जब घर वालो को दोनों के प्यार का पता चला तो पहरा बिठा दिया गया। घरवाले तो पहले से खिलाफ थे पंचायत भला इस रिश्ते को कैसे मंजूर करती। हारकर दोनों ने मौत को गले लगा लिया ।इस तरह की ज्यादातर घटनाएं पश्चिमी उत्तर प्रदेश या हरियाणा के कुछ जिलों में ज्यादा घाट रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, मुजफ्फरनगर , बुलंद शहर , गाजियाबाद , नॉएडा , अलीगढ़ , आगरा आदि में ओनर किलिंग या इशक में निराश होकर आत्महत्या करने के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। हरियाणा के झज्जर , रोहतक , फरीदाबाद आदि इलाकों में ऐसी घटनाएं ज्यादा बढ़ रही हैं। सरकार न तो प्यार करने वालों को सुरक्षा उपलब्ध करवा पा रही है और नाही समाज इस तरह के मामलों को स्वीकारने के लिए तैयार है । प्यार के लिए मर मिटने का लड़के -लड़कियों का जूनून कैसे परवान चढ़ा , इसके लिए क्या जिम्मेदार है ? फ़िलहाल यह सवाल करने का वक्त नहीं है। यह समय है इस बीमारी को दूर करने का। मगर इसके लिए कोई प्रयास नहीं कर रहा । प्यार करने वालों और प्यार की बली वेदी पर चढ़ने वालों की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोतरी होती जा रही है। गाँव और शहरी परिवेश में जमीन आसमान का अंतर होता है। गाँव में अगर किसी की बेटी किसी लड़के के साथ प्यार करती है और उससे शादी कर लेती है तो आसपास के लोग बेटी वाले के परिवार का जीना हराम कर देते हैं। हर पल उसे ताने दिए जाते हैं, उसे नजरों से गिरा दिया जाता है। उन्हीं तानों और बेईज्जती से बचने के लिए बेटी वाले या तो अपनी बेटी को ही मार डालते हैं या फिर बेटी के आशिक को मौत के घात उतार देते हैं। इसका परिणाम ये होता है की लड़का और लडकी वाले दोनों परिवार बर्बाद हो जाते हैं। जबकि अगर समझदारी से काम लिया जाए, या तो उन्हें समझा बुझा दिया जाए या फिर उनकी शादी करवा दी जाए तो सब कुछ ठीक हो सकता है । मगर इसके लिए सरकारी पहल की भी जरूरत है । ऐसे मामले निबटाने के लिए भी एक विशेष आयोग की जरूरत है, जो ऐसा मामला सामने आने पर लड़का और लडकी वालों के बीच पुल का काम कर सके।
Thursday, July 22, 2010
दलित दुलारे , राहुल प्यारे , गए कहाँ रे ...
वे नेता देश के लिए ककुछ भी करने को तैयार रहते थे, वे हमेशा जन हित की बात करते थे. उनका आचरण भी सादगी भरा और निस्वार्थ
होता था . इसलिए लोग उन्हें अपना आदर्श मानते थे. आज की तारीख में ऐसा कौन सा नेता है जिसे लोग अपना आदर्श अमानते हों. इसलिए
किसी एक की बात हो तो अलग है यहाँ तो सभी राजनीतिक पार्टियां और ज्यादातर नेता ही ऐसे हो गए हैं. याबी कि इलाज की नहीं , आपरेशन
की जरूरत है. इसके लिए सख्त क़ानून की व्यवस्था की जरूरत है ,जों कभी पूरी नहीं होने वाली. क्योंकि वही छिनरा , वही डोली के संग वाली बात आड़े आ जाती है. यानि कि क़ानून बनाने वाले भी तो नेता ही हैं . और वे ऐसा कोई क़ानून क्यों बनाएंगे जिसे आगे चलकर वही तोड़ने वाले हों .इस मुश्किल का कोई हल है क्या ?
Monday, July 19, 2010
Sunday, July 18, 2010
अध्यात्म और अश्लीलता
Friday, July 16, 2010
अब इंसान सब्जियां नहीं खाता , सब्जियां इंसान को खा रही हैं.
अब इंसान सब्जियां नहीं खाता , सब्जियां इंसान को खा रही हैं
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अब इंसान सब्जियां नहीं खाता , सब्जियां इंसान को खा रही हैं.
और केन्द्र सरकार है कि चैन के बंशी बजा रही है ,विपक्ष भी मंहगाई को लेकर उतना गंभीर नहीं है, जितना कि होना चाहिए . सभी विपक्षी पार्टियों ने एक दिन का बंद रखा और फिर भूल गईं, कुछ राज्य स्तर की पार्तितों ने भी एकाध दिन हो हल्ला करके मामले को शांत कर दिया. मगर इससे फायदा क्या हुआ. क्या सरकार पर किसी तरह का वजन पड़ा, क्या सरकार ने किसी भी चीज के थोड़े भी दाम घटाए ? नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ. उलटा अगले ही दिन केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने यह कहकर धमाका कर दिया कि चीनी को भी सरकारी नियंत्रण से बाहर लाया जाएगा. यानि कि सरकार चीनी पर जों सब्सिडी दिया करती थी, उसे बंद किया जाएगा . इससे चाय पीना भी दुर्लभ हो जाएगा . चीनी की कीमते आस्मां छूने लगेंगी .दुसरा धमाका पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवरा ने यह बयान देकर किया है कि ज्यादा पैसे देकर रसोई गैस के उपभोक्ता कभी भी सिलेंडर मगा सकते हैं. इससे गैस एजेंसी के मालिकों को सरेआम भरष्टाचार करने की पूरी छूट मिल जायेगी . एक तो पहले से ही गैस एजेंसी वाले उपभोक्ताओं को खून के आंसू रुलाते थे, ब्लेक में सिलेंडर देते थे, कम गैस देते थे. मनमाने ढंग से डिलीवरी करते थे . अब मुरली देवरा की शह पर वे और भी ज्यादा निरंकुश हो जायेंगे . अब वे मनमाने तरीके से डिलीवरी देंगे और जब उनकी इच्छा होगी , तब देंगी . जानबूझकर लेट करेंगे और मुहमांगी रकम वसूलेंगे . अतिरिक्त रकम के प्रावधान की बात कहकर मुरली देवरा ने गैस एजेंसी के मालिकों को भ्रष्टाचार करने का खुला लाइसेंस दे दिया है . मंहगाई कम करने के बजाय मंहगाई बढाने के इंतजाम किये जा रहे हैं . हालत ये है कि
महंगाई से पूरा देश त्राही त्राही कर रहा है। सारी कमाई को महंगाई सुरसा के मुंह की तरह निगल रही है। पिछले हफ्ते खाने-पीने की चीजों की महंगाई दर में मामूली सी कमी दिखाई गई, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। महंगाई के वजन से मध्य वर्ग की कमर टूट गई है और गरीबों ने खाने में सब्जी का नाम लेना ही बंद कर दिया है।
हालांकि आंकड़ों के लिहाज से खाने पीने की चीजों की मंहगाई दर 12.63 फीसदी हो गई है। इससे पहले ये 12.93 फीसदी थी। लेकिन आंकड़ों की बाजीगरी की हकीकत कुछऔर ही है।
अहमदाबाद में35 रुपए किलो मिलने वाली भिंडी 45 रुपए किलो हो गई है। फूल गोभी 45 रुपए से 60 रुपए किलो हो गई है। करेला 35 रुपए से 40 रुपए किलो होकर स्वाद और कसैला कर रहा है।
लखनऊ में आलू 7 से 8 रुपए किलो मिलता था वो अब 10 से 13 रुपए किलो मिल रहा है। शिमला मिर्च 32 से 36 रुपए किलो मिलती थी वो अब 40 से 48 रुपए किलो मिल रही है। प्याज 8 से 10 रुपए किलो मिलता था अब वो 16 से 20 रुपए किलो होकर लोगों के आंसू निकाल रहा है।लगता है अब इंसान सब्जियां नहीं खाता बल्कि सब्जियां इंसान को खाने लगी हैं.
जाहिर है पूरे देश में खाने-पीने की चीजों के दामों में आग लगी हुई है। और सरकार के तमाम दावे खोखले साबित हुए हैं।इन आंकड़ों ने केन्द्र सरकार के झूठे दावों की पोल खोल डी है , और अब उस क़ानून की मांग जोर पकड़ने लगी है जों सरकार बनने वालों को कभी भी सरकार गिराने का अधिकार देता हो .