Wednesday, July 27, 2011

जिनके खातिर हम लहू बहाते हैं . वो दर्द में भी जख्म दिए जाते हैं.

जिनके खातिर हम लहू बहाते हैं .
वो दर्द में भी जख्म दिए जाते हैं.

२६ जुलाई २००५ . इस तारीख को भला मैं कैसे भूल सकता हूँ. मेरे जैसे और भी न जाने कितने मुम्बईकर या फिर इस दिन की विभीषिका झेलने के अभिशप्त मुंबई आये लोग भी इस डरावनी तारीख को नहीं भूल सकते. मुझे याद है उस दिन वर्ली जाम्बोरी मैदान में बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती की सभा भी थी. मैं बसपा का मीडिया प्रभारी था, इस नाते पत्रकार बंधुओं को बुलाना , उनकी 'देख-रेख' करने का दायित्व मेरा था. सतीश चंद्र मिश्रा का भाषण होते-होते सभा के लिए लगाए पंडाल में पानी भर चूका था और जब मायावती जी का भाषण हुआ तब तक बादल अपना रौद्र रूप धारण कर चूका था. काफी 'समझदार' कार्यकर्ता तो मौक़ा देखकर निकल लिए मगर मैं रुका रहा. सभा खत्म होते ही मैं शमशाद भाई और दीपक मित्रा के साथ इनोवा से निकल लिया . हरिनाथ यादव उस समय हिंदमाता में थे. सभा कवर करने वही आये हुए थे. उन्हें अपने ऑफिस जाना था तो वे भी हमारे साथ हो लिए . उनेहं ऑफिस छोड़ते तब तक तो आसमान से प्रलय बरसने लगी थी. सड़कों पर पानी भर चुका था , और जगह-जगह ट्रैफिक जाम होने लगा था. किसी तरह उन्हें सकुशल छोड़ने के बाद जब हम आगे के लिए बढे तो मुश्किल और भी बढ़ने लगीं. शमशाद भाई और दीपक मित्रा को गोकुलधाम आना था जबकि मुझे मीरा रोड आना था. जिधर देखिये सड़क जाम थीं. पानी कहर बनकर टूट रहा था. चारों तरफ अनिश्चितता का माहौल था. कुछ समझ में नहीं आ रहा था की ऐसे वक्त क्या किया जाए. सब दुविधा में थे. मुझे साथी पत्रकारों के फोन आ रहे थे जो सभा में नहीं पहुँच पाए थे. महाराष्ट्र अध्यक्ष का फोन नहीं लग रहा था . बसपा के बारे में मुझे इतनी ही जानकारी मिल पाई थी की बहन जी सकुशल होटल पहुँच गयी और उत्तर प्रदेश के वर्तमान परिवहन मंत्री राम अचल राजभर की पिस्तौल पानी में ही गिर गयी थी जो बड़ी मशक्कत के बाद मिल पाई , इसके बाद पार्टी के बड़े नेताओं से सम्बन्ध विच्छेद हो गया. इधर नई इनोवा की परिक्षा थी, शुरुआत में तो गाड़ी बड़े धैर्य और जिम्मेदारी का परिचय देती रही मगर बरसात तो तूफ़ान में तब्दील हो चुकी थी और तूफ़ान का मुकाबला कोई भी गाड़ी भला कैसे कर सकती है ? शमशाद भाई ने सूचना दी की नीचे की तरफ से गाड़ी में पानी भरने लगा है. इसके बाद वह सिलसिला चल निकला . पूरी गाड़ी में पानी ही पानी. फिर जब सामने निगाह दौडाई तो कोहराम मचा था. सब लोग गाड़ियों से उतरकर पैदल चल रहे थे. गाड़ियों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था. जब जान पर बन आये तो बाकी साभी नीचे गौण हो जाती हैं. हमने गाड़ी परफेक्ट किस जगह पर छोड़ी यह तो याद नहीं मगर हम गर्दन तक पानी में जद्दोजहद करते हुए लगभग एक घंटा में सांताक्रुज के फ्लाईओवर पर पहुंचे . लोगों की चीख पुकार और मरकर बहे पशुओं के साथ हमने यहाँ तक की मंजिल कैसे तय की ये हम ही जानते हैं. इस बीच घर पर फोन कर श्रीमती को बारिस में फंसने की सूचना दी तो उसने मजाक में टाल दिया , उसके बाद फोन लगा ही नहीं. सब कुछ बंद हो चूका था. हम जहाँ पहुंचे वहाँ पर बेस्ट की एक बस खडी थी, उसमे काफी जगह थी. बरसात जोरों पर थी ही, बाहर बच्चे -महिलायें रो रहे थे. उनमे से कुछ ने जब बस में चढना चाहा तो बस वालों ने गाली गलौच कर , लड़ाई झगदा कर सबको नीचे उतार दिया . इसके बाद तो उसने गेट ही बंद कर लिए. वे लोग इयमों का हवाला दे रहे थे . हम भी नीचे उतार दिए गए. अब पूरी रात सामने थी. ऊपर से आसमानी आफत थी तो इधर पेट ने भी बगावत करने शुरू करदी. भरी बरसात में पेट से चिंगारियां निअक्ल रही थी. चारों तरफ पानी ही पानी था और हम लोग प्यासे थे. आस-पास कुछ दुकानें थी . उन्होंने इंसान की मजबूरी का अच्छी तरह ' फायदा' उठाया . बड़ा पाब पचास रुपये तक में बेचा . सुनते हैं की मुसीबत के समय मुंबई एक हो जाती है. मगर उस महा मुसीबत की महाघडी की सच्चाई आप तक पहुंचा रहा हूँ. उस रत हम भूखे ही रहे. हमें कुछ नहीं मिल पाया . दूकान वाले चाहते तो मदद कर सकते थे मगर उन्होंने मदद के बजाय भंवर में फंसे लोगों का उपहास उडाया , उन्हें ब्लैकमेल किया. बस वाला भी अगर चाहता तो ठण्ड से कांपते , बुखार में तपते कुछ अति जरूरत मंद लोगों को उस बस में सहारा दे सकता था, वह खाली बस थी, उसमें कुछ ही लोग बैठे थे. खैर . मैं तू सुबह शमशाद भाई और दीपक मित्र की मदद से गोकुलधाम तक पहुँच गया मगर जिनेहं हम अपना कहते हैं . जिनके लिए 'विशेष ' परिस्थितियों में हम खून तक बहाने के लिए तैयार होते हैं वे मुसीबत के समय इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं.
जिनके खातिर हम लहू बहाते हैं .
वो दर्द में भी जख्म दिए जाते हैं.
- मुकेश कुमार मासूम

Friday, July 1, 2011

मौन व्रत तोडिये मनमोहन जी ,
अगर अब नहीं बोले तो कभी नहीं बोल पायेंगे

देश की जनता हाहाकार कर रही है. भूख , गरीबी, बेरोजगारी और मंहगाई ने सच्चे और मेहनतकश लोगों का जीना मुहाल कर दिया है. तंग आकर कुछ लोग चोरी, डकैती और नक्सलवाद का रास्ता पकड़ रहे हैं तो कम दिलवाले लोग मौत को गले लगा रहे हैं. जो बचे हैं वे कर्ज लेकर या कम खा-पीकर , कम खर्चे कर अपनी गुजर -बसर कर रहे हैं. हाँ, दलालों की मौज है . जो भ्रष्टाचारी हैं उन्हें कोई तकलीफ नहीं है. उलटे सरकार का वरदहस्त हासिल कर ऐसे लोग अपने देश का धन दुसरे देशों में भेज रहे हैं.हर घड़ी भ्रस्टाचार हो रहा है, हर जगह भ्रष्टाचार है. हालात ऐसे हैं कि अगर कुछ चुनिन्दा लोग अपना ईमान बरकरार रखना भी चाहें तो नहीं रख पा रहे हैं. अगर कोई अपना काम करवाने के लिए सरकारी ऑफिस जाता है तो आम आदमी के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता है. अगर कोई क़ानून की दुहाई दे तो उसे ऐसे देखा जाता है जैसे उसने कितनी बड़ी नादानी अथवा कितना बड़ा गुनाह कर दिया हो. अगर वह अपने अधिकारों की बात करता है तो उसे दुत्कार दिया जाता है. उसके काम में हजारों दोष निकाल दिए जाते हैं, अगर वह अपना सम्मान बचाने के लिए प्रयासरत दिखा तो सरकारी काम में अड़चन डालने वाली धरा लगवाकर , जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाकर उसे निपटा दिया जाता है. पुलिसवाले सब जानते हैं फिर भी आम आदमी की नहीं बल्कि भ्रस्टाचार करने वालों की बात ही मानते हैं. ये महज सरकारी गतिविधियां नहीं बल्कि सिस्टम की हकीकत बन चुका है. अब इससे होता ये है कि सरकार भले ही किसीकी क्यों न बन जाए मगर भ्रष्टाचार की यह दास्ताँ ऐसे ही दोहराई जाती है. हर तरह की चक्की को पीसने वाला और उस चक्की में पीसने वाला व्यक्ति आम व्यक्ति ही होता है. और अब तो हद हो चुकी है. जुल्मो सितम की इन्तिहाँ हो चुकी है. और जैसे कि कहा गया है. जब -जब ऐसे हालात होते हैं . पानी सिर से ऊपर उतरता है तो कोई न कोई जन्म लेता है, आगे बढ़ता है उसमे सुधार लाने के लिए . आज अन्ना हजारे एंड टीम के आंदोलन को उसी नजरिये से देखना चाहिए .अन्ना हजारे की टीम के आगे आज देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस भी नतमस्तक की मुद्रा में है तो इसका सबसे बड़ा कारण आम आदमी की ताकत है. अगर हर कोई अपनी ताकत को पहचानकर कार्य करे तो बड़े से बड़ा असम्भव काम भी संभव हो सकता है. अन्ना हजारे एंड टीम आज सरकार बदलने के लिए नहीं बल्कि सिस्टम बदलने के लिए काम कर रही है. वे एक सशक्त लोकपाल चाहते हैं ताकि आं आदमी के हितों की रक्षा हो सके, सरकार भले ही जिसकी आये मगर आम आदमी के अधिकार सुरक्षित रहें. अगर अन्ना हजारे सच कह रहे हैं तो उनके इस पुनीत कार्य में हर देश प्रेमी को सहयोग करना चाहिए , भले ही वो किसी भी पार्टी या संगठन से क्यों न जुडा हो. देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी ईमानदार व्यक्ति बताया जाता है. अगर ये भी सच है तो उनको अपना मौन तोडना चाहिए .अगर अब भी वे खामोश रहे तो फिर कभी नहीं बोल पायेंगे . क्योंकि अगली बार अगर चांस मिला भी तो उनके लिए कोई चांस नहीं है. (राजनीतिक चाटुकार पहले से ही भावी प्रधानमंत्री तय कर चुके हैं )इसलिए प्रधानमंत्री को अपने होने का एहसास दिलाना चाहिए . सिर्फ कह देने भर से काम नहीं चलता , उन्हें प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाने की पहल करनी चाहिए . अपनी और अपनी सहयोगी पार्टियों को भी इसके लिए तैयार करना चाहिए . आखिर यह पद किसी एक व्यक्ति या पार्टी की बपौती तो है नहीं. आज कोई और है कल कोई और आएगा .
- मुकेश कुमार मासूम

Saturday, August 14, 2010

NOTICE is hereby given that with effect from
15th July 2010 the Registered Office of Marg
Publications Private Limited has been changed
from B / 12, Sardaram Park, 34, Sasoon Road,
Pune – 411 001 to Flat I / 004, Ground Floor,
Sonam Chandra, Phase – 1, Old Golden Nest,
Mira Road East. Thane – 401 105. All communi
cations should henceforth be made at the afor
esaid address.
-For Marg Publications Private Limited
By order of the Board,
Mukesh Kumar Masoom
Director
Dated 13th August 2010

Sunday, July 25, 2010

इशक की आग में झुलसता हिन्दुस्तान

इशक की आग में समूचा हिन्दुस्ता झुलस रहा है।पंजाब के कपूरथला और दिल्ली सटे उत्तर परेद्श के जिला बुलंदशहर में एक दिन में इशक के चक्कर में तीन घटनाएं घटी हैं। कोई दिन ऐसा नहीं है जब देश के किसी न किसी हिस्से में दो चार लोग रोजाना इश्क की चक्की में नहीं पिसते हों। कपूरथला के कठुआ में एक पिता ने बेटी को करंट लगा मार डाला। मृतिका का नाम गुरजीत कौर है। पिता ने बेटी के प्रेमी को भी मारने की कोशिश की लेकिन वो बच गया और उसकी सूचना पर पुलिस ने हत्यारे पिता को गिरफ्तार कर लिया।
यूपी के बुलंदशहर में एक युवक की हत्या प्यार करने की वजह से कर दी गई। मृतक जिस लड़की से प्यार करता था वो रिश्ते में उसकी मौसी लगती थी।
यूपी के बुलंदशहर में ही एक ही गोत्र में प्यार करने की सजा दो प्यार करने वालो को मिली। समाज ने उनके प्यार को अस्वीकार कर दिया जसके बाद प्रेमी जोड़े ने जहर खाकर खुदकुशी कर ली।
बुलंदशहर के तनु और गुड़्डू एक दूसरे बेहद प्यार करते थे। दोनों एक ही गोत्र के थे। दोनों ने शुक्रवार को खुदकुशी कर ली। गांव के लोगों के मुताबिक दोनों एक ही कुनबे के थे। जाति और गोत्र भी एक ही था। इसलिए समाज की नजर में वो रिश्ते से भाई बहन थे। कुछ महीने पहले जब घर वालो को दोनों के प्यार का पता चला तो पहरा बिठा दिया गया। घरवाले तो पहले से खिलाफ थे पंचायत भला इस रिश्ते को कैसे मंजूर करती। हारकर दोनों ने मौत को गले लगा लिया ।इस तरह की ज्यादातर घटनाएं पश्चिमी उत्तर प्रदेश या हरियाणा के कुछ जिलों में ज्यादा घाट रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, मुजफ्फरनगर , बुलंद शहर , गाजियाबाद , नॉएडा , अलीगढ़ , आगरा आदि में ओनर किलिंग या इशक में निराश होकर आत्महत्या करने के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। हरियाणा के झज्जर , रोहतक , फरीदाबाद आदि इलाकों में ऐसी घटनाएं ज्यादा बढ़ रही हैं। सरकार न तो प्यार करने वालों को सुरक्षा उपलब्ध करवा पा रही है और नाही समाज इस तरह के मामलों को स्वीकारने के लिए तैयार है । प्यार के लिए मर मिटने का लड़के -लड़कियों का जूनून कैसे परवान चढ़ा , इसके लिए क्या जिम्मेदार है ? फ़िलहाल यह सवाल करने का वक्त नहीं है। यह समय है इस बीमारी को दूर करने का। मगर इसके लिए कोई प्रयास नहीं कर रहा । प्यार करने वालों और प्यार की बली वेदी पर चढ़ने वालों की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोतरी होती जा रही है। गाँव और शहरी परिवेश में जमीन आसमान का अंतर होता है। गाँव में अगर किसी की बेटी किसी लड़के के साथ प्यार करती है और उससे शादी कर लेती है तो आसपास के लोग बेटी वाले के परिवार का जीना हराम कर देते हैं। हर पल उसे ताने दिए जाते हैं, उसे नजरों से गिरा दिया जाता है। उन्हीं तानों और बेईज्जती से बचने के लिए बेटी वाले या तो अपनी बेटी को ही मार डालते हैं या फिर बेटी के आशिक को मौत के घात उतार देते हैं। इसका परिणाम ये होता है की लड़का और लडकी वाले दोनों परिवार बर्बाद हो जाते हैं। जबकि अगर समझदारी से काम लिया जाए, या तो उन्हें समझा बुझा दिया जाए या फिर उनकी शादी करवा दी जाए तो सब कुछ ठीक हो सकता है । मगर इसके लिए सरकारी पहल की भी जरूरत है । ऐसे मामले निबटाने के लिए भी एक विशेष आयोग की जरूरत है, जो ऐसा मामला सामने आने पर लड़का और लडकी वालों के बीच पुल का काम कर सके।

Thursday, July 22, 2010

दलित दुलारे , राहुल प्यारे , गए कहाँ रे ...

दलित दुलारे , राहुल प्यारे , गए कहाँ रे ...
पिछले कुछ दिनों से देश के कई राज्यों में कई अनहोनी घटनाएं घटी हैं . सबसे बड़ी दुर्घटना तो केन्द्र में बैठी अंधी , बहरी, लंगडी, लूली और पूरी तरह अपाहिज और अक्षम सरकार द्वारा बार-बार डीजल , पेट्रोल , तेल के दाम बढ़ाना है . मंहगाई से जूझ रहे आम इंसानों को और भी मंगाई की आग में झोंकना है, इसके बाद नक्सलियों द्वारा बेगुनाह सुरक्षाकर्मियों को मौत के घाट उतारना है. रेल दुर्घटना है . जलता हुआ कश्मीर है . राक्षसी बेरोजगारी और भ्रष्टाचार है . ये सब पहले भी थे मगर कुछ महीने से इनमे बहुत ज्यादा इजाफा हुआ है , इनसे पीड़ित होकर पूरा देश रो रहा है , चिला रहा है मगर एक व्यक्ति ऐसा है जों खामोश है . उसका नाम है राहुल गांधी . अपने आपको दलित हितैषी होने का ढिंढोरा पीटने वाले राहुल गांधी न जाने कहाँ गायब हो गए हैं, वे तब भी प्रकट नहीं हो पाए , जब हरदोई से उनकी ब्रिगेड का एक नेता अचानक गायब हो गया और जख्मी हालत में लखनऊ में मिला. वह तो खैर मिल गया मगर राहुल गांधी अभ तक अज्ञातवास में हैं. लोग गाते फिर रहे हैं -दलित दुलारे , राहुल प्यारे , गए कहाँ रे ...चुनाव के समय वे उत्तर प्रदेश के किसी दलित की झोंपडी में रात बिताते किसी टी.वी. में जरूर दिख जायेंगे. अगले दिन के अखबारों में वे किसी दलित बच्चे को गोद में उठाये हुए नजर आयेंगे. मगर जब दलितों की हालत बाद से बदतर की जाती है और करने वाले उनके पाने होते हैं, तब उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रया नहीं आती. न वे प्रेस कोंफ्रेंस करते नजर आते हैं, और न अखबारों में प्रेस विज्ञप्ती ही भेजती हैं. केन्द्र की सरकार कांग्रेस की अगुवाई वाले यू पी ऐ की सरकार है , जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं. कांग्रेस की अध्यक्ष भी सोनिया गांधी हैं.अक्सर विपक्ष के लोग आरोप लगाते रहे हैं कि प्रधानमंत्री भी रबर स्टेम्प से कम नहीं हैं. यानि कि कुल मिलाकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी ही इस देश के रहनुमा हैं. वही शासन चला रहे हैं. वही मंहगाई बढ़ा रहे हैं. शोषितों, पीडितो, दलितों, मुफ्लिशों, बेरोजगारों, किसानों, मजदूरों और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों का अगर जीना हराम है , तो उसके पीछे इन्हीं मान बेटों का हाथ है . अगर यही लोग इस सबके लिए जिम्मेदार हैं तो गरीबों का मसीहा बनने का नाटक किसलिए , दलितों का सच्चा हितैषी बनने का ढोंग किसलिए ?आम आदमी के साथ होने का ढिंढोरा क्यों ? और नाटक इन्हें करना है तो करें, इनका साथ किसलिए ?देश में दो वर्गों के बीच बहुत बड़ी खाई पैदा कर दी गयी है. गरीब और मेरे के बीच की खाई . सिर्फ कुछ हजार लोगों का देश के सभी संसाधनों पर कब्जा है. देश की समस्त संपत्ति पर कब्जा है और कई करोड लोग दो जून की रोटी खाने तक के लिए मोहताज हैं. शुद्ध पेयजल की छोडिये , उन्हें नाले का गंदा पानी भी नसीब है. अच्छे और नए कपडे की बात अलग है , फटे और पुराने कपडे भी मयस्सर नहीं हैं . इतना बड़ा फर्क किसके शासन में हुआ ? देश पर सबसे ज्यादा राज किसने किया ? जों देश के लिए अन्न उगाते हैं, यानि देश का अन्नदाता अगर आज तक फटेहाल है, सुख सुविधाओं से मोहताज है तो इसका जिम्मेदार कौन है ? अगर मा-बेटे की यह जोड़ी अब भी नींद में सोई है तो देश के नौजवानों के फर्ज बंटा है कि वे जाग जाएँ और अपने हक के लिए शांतिपूर्वक और संवैधानिक तरीके से संघर्ष करें .











शर्मशार होता लोकतंत्र का मंदिर ,
उद्दंड होते जन प्रतिनिधि
बिहार की विधान सभा में जों कुछ हुआ उसे हिन्दुस्तान सहित सारे संसार ने देखा. आज का युग सूचना क्रान्ति का युग है. पलक झपकते ही कोई भी समाचार समस्त विश्व की वेबसाईट पर दिखने लगता है. टी.वी . चैनल द्वारा सब कुछ बहुत जल्द ही दिखा दिया आजाता है . बिहार विधान सभा में जनता के चुने हुए विधायकों को जिस तरह मारपीट करते, गाली -गलौच करते,विधान सभा अध्यक्ष की तरफ चप्पल फेंकते , महिला विधायकों द्वारा मार्शलों पर गमलों से प्रहार करते हुए देखा, उससे लोकतंत्र का मंदिर शर्मशार हो गया. हंगामे के बाद सदन की कार्यवाही दो दिन के लिए स्थगित कर दी गई है। विधायनसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने विपक्ष के 67 विधायकों को कार्यवाही बाधित किए जाने और गलत व्यवहार के चलते पूरे मॉनसून सत्र के लिए निलंबित कर दिया।अध्‍यक्ष ने विपक्ष के 67 विधायकों को इस सत्र के लिए निलंबित कर दिया है। इनमें राजद के 42, एलजेपी के 11, कांग्रेस के 02, सीपीआई (एमएल) के 04, बीएसपी के 02, सीपीएम के 02, सीपीआई के ०४ निर्दलीय 02 हैंराजद अध्यक्ष अब्दुल बार सिद्दीकी और सदन में राजद के उप नेता शकील अहमद निलंबितों में शामिल हैं। बिहार हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री समेत 11 लोगों के खिलाफ 11 हजार ४ सौ १२ करोड़ की वित्तीय गड़बड़ी मामले की जांच सीबीआई को सौपी है। इसके बाद से विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। हालत ये है कि धरने पर बैठे विधायकों को बाहर निकालने के लिए मार्शलों का सहारा लेना पड़ा। कांग्रेस की विधायक कुमारी ज्योति ने सदन के बाहर गैर जिम्मेदाराना व्यवहार किया। उन्होंने भाजपा नेताओं पर गुस्साते हुए मार्शलों पर गमले उठाकर फेंके और वहीं जमीन पर लेट गई।विधायक कोई आम आदमी नहीं होता, उसे लाखों मतदाता चुनते हैं और उससे उच्च आदर्शों, उचित व्यवहार और सज्जनता की अपेक्षा रखते हैं.और जब वही विधायक सदन में जाकर गलत हरकत करते हैं तो आम इंसान अपने आपको ठगा सा महसूस करता है. भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना अच्छी बात है. अपने किसी और अधिकार को पाने के लिए कोई भी आन्दोलन करना चाहिए , अगर नीतिश कुमार ने या उनके साथियों ने कोई गलत काम किया है . पैसों का गबन किया है तो अवश्य ही उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और अगर नहीं होती तो हर किसको को शांतिपूर्वक आंदोलन करने का अधिकार है , मगर क़ानून हाथ में लेकर सदन का अपमान करना, उद्दंड होकर विधान सभा की छवि धूमल करना किसी भी हालत में उचित नहीं है.विधायकों को यह अधिकार बिलकुल नहीं है कि वे लोकतंत्र की मर्यादा को ही नष्ट करदें. यह पहली बार नहीं हुआ है . इससे पहले विभिन्न प्रदेशों के विधान भवन में माननीयों द्वारा मारपीट की घटनाएं हो चुकी हैं. खूब जूता चप्पल चले हैं, लेकिन यह सिलसिला अब बंद होना चाहिए . सिर्फ कुछ दिनॉ के लिए निलंबन की सजा से कुछ होने वाला नहीं है. आजकल लोग कहते फिरते हैं कि अब पहले जैसे नेता नहीं रहे , जयप्रकाश नारायण जैसे, सरदार पटेल जैसे, महात्मा गांधी जैसे . अब
वे नेता देश के लिए ककुछ भी करने को तैयार रहते थे, वे हमेशा जन हित की बात करते थे. उनका आचरण भी सादगी भरा और निस्वार्थ
होता था . इसलिए लोग उन्हें अपना आदर्श मानते थे. आज की तारीख में ऐसा कौन सा नेता है जिसे लोग अपना आदर्श अमानते हों. इसलिए
किसी एक की बात हो तो अलग है यहाँ तो सभी राजनीतिक पार्टियां और ज्यादातर नेता ही ऐसे हो गए हैं. याबी कि इलाज की नहीं , आपरेशन
की जरूरत है. इसके लिए सख्त क़ानून की व्यवस्था की जरूरत है ,जों कभी पूरी नहीं होने वाली. क्योंकि वही छिनरा , वही डोली के संग वाली बात आड़े आ जाती है. यानि कि क़ानून बनाने वाले भी तो नेता ही हैं . और वे ऐसा कोई क़ानून क्यों बनाएंगे जिसे आगे चलकर वही तोड़ने वाले हों .इस मुश्किल का कोई हल है क्या ?







Monday, July 19, 2010








हादसे पर हादसे , जिम्मेदार कौन ?
टिकट लेकर सफर करने वाले बेकसूरों का क्या दोष ?
फिर एक हादसा हो गया . ट्रेन हादसा . ८० से ज्यादा उन बेकसूरों की मौत हो गयी जों लोग टिकट लेकर सफर कर रहे थे. ममता बनर्जी के १५ महीने के कार्यकाल में यह ११ वां हादसा है. ममता बनर्जी हाकिया हादसे में साजिस की बू तलाश रही हैं तो भाजपा ने उनसे रेल मंत्रालय ही छीन लेने की मांग की है. भले ही यह हादसा मानवीय भूल हो या फिर इसमें किसी तरह की नक्सली साजिस हो ,मगर इसमें नुक्सान सिर्फ उन निर्दोषों का हुआ है जिनकी हिफाजत कंरने की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की थी लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी को संभाल नहीं पाई. इसका जिम्मेदार कौन है ? केन्द्र सरकार अगर नक्सली समस्या का समाधान नहीं कर रही है तो इसकी सजा किसको मिलनी चाहिए ? निर्दोष नागरिकों को तो हरगिज नहीं . मगर हो यही रहा है . सब बेगुनाह ही मारे जा रहे हैं. कभी नक्सली घात लगाकर सी आर पी एफ के जवानों को मौत के घाट उतार देते हैं तो कभी किसी नागरिक को . पिछले कुछ समय से ये नक्सली ट्रेन को अपने निशाने पर ले रहे हैं. इसमें भी आम जनता की बलि चढ रही है. सेब चाकू पर गिरे या चाकू सेब पर , इससे नुक्सान तो हमेशा सेब का ही होता है. यही हाल जनता के साथ हो रहा है . हर हाल में शोषण उसकी हो रहा हो. नक्सली सोचते होंगे कि जब वे आम जनता को निशाना बनाएंगे तो केन्द्र सरकार पर दवाब बढ़ेगा , सरकार उनकी मांग मानेगी , मगर सच्चाई इससे दूर है .जितने चाहे जवान /अधिकारी शहीद हों . कितनी ही जनता का खून बहे . केन्द्र की बाहरी सरकार के कान पर जूं रेंगने वाली नहीं है .इसलिए नक्सलियों को अपनी रणनीति बदलनी चाहिए . केन्द्र सरकार को भी नक्सलियों से सख्ती से निपटना चाहिए . और अगर केन्द्र सरकार ऐसा नहीं कर पाति तो उसे सत्ता में बने रहने का कोई हक नहीं है .
वैसे भी यह सरकार हर मोर्चे पर फेल है. केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार मंहगाई बढाते जा आरहे हैं. केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवरा डीजल, पेट्रोल और घरेलू गैस के दाम बढ़ाकर मंगाई बढाने में अपना योगदान दे रहे हैं. मंनरेगा में अरबों का भ्रष्टाचार है . देश का पैसा मनरेगा जैसी भ्रष्ट योजना में लगाकर कुछ लोगों को तो खुश किया जा रहा है, मगर यह पैसा जिनकी मेहनत और गाढ़ी कमाई की बदौलत विभिन्न टैक्स के माध्यम से आता है , उनका जीना हराम किया जा रहा है . विदेश मंत्री कृष्णा जी अभी हाल ही में पाकिस्तान गए तो उनकी वार्ता भी बुरी तरह फेल हो गयी . दूरसंचार मंत्री पर ३ जी व अन्य सेवाओं की नीलामी में रिश्वत लेने की आरोप लगे. देश की सड़कों का बुरा हाल है . महानगरों को अगर छोड़ दिया जाए तो देश भर में बिजली के लिए त्राहि मम मची हुयी है . कुल मिलाकर हर क्षेत्र में कांग्रेस फेल है . कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां, जों कि सरकार में हैं , वे सब बुरी तरह से फेल हैं. लगता है सरकार ऐसे ही रामभरोसे चल रही है .
ऐसी कमजोर सरकार देश का भला नहीं कर सकती, देशवासियों की सुरक्षा भी नहीं कर सकती . इस सरकार का तो बस एक ही इलाज किया जा सकता है . आने वालों चुनावों में इस सरकार में शामिल सभी पार्टियों को विसर्जित कर डालिए . जब तक यह सरकार है तब तक हम ऐसे हादसों और मंहगाई जैसी महामारी को झेलने के लिए अभिशप्त रहेंगे.